क्या किसी अधिकारी का सिर्फ अपना कर्तव्य निभाना आज हमें Heroism लगने लगा है? | Tukaram Mundhe

Updated: Aug 19
सवाल Tukaram Mundhe जैसे किसी एक अधिकारी का नहीं, उस व्यवस्था का है जहां ईमानदारी से ड्यूटी करना भी असाधारण उपलब्धि मान लिया जाता है।

Tukaram Mundhe जब किसी नियम को सख्ती से लागू करते हैं, मिलावटखोरी के खिलाफ कार्रवाई करते हैं या प्रशासनिक जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाते हैं, तो उनकी चर्चा होती है। सोशल मीडिया पर उनके काम की तारीफ होती है। उन्हें सख्त, ईमानदार और निडर अधिकारी कहा जाता है।
तारीफ होनी भी चाहिए। लेकिन इस तारीफ के बीच एक सवाल कहीं दब जाता है — क्या उन्होंने वास्तव में ऐसा कुछ किया, जो एक सरकारी अधिकारी के कर्तव्य से बाहर था? क्या कानून लागू करना बहादुरी है? क्या मिलावटखोरों पर कार्रवाई करना कोई असाधारण उपलब्धि है? क्या जनता के स्वास्थ्य और हितों की रक्षा करना किसी अधिकारी का अतिरिक्त प्रयास है? क्या नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना जनता पर कोई एहसान है?
नहीं। यह उस अधिकारी की जिम्मेदारी है। यही बात इस पूरे विमर्श को असहज बनाती है।
जब कर्तव्य “heroism” बन जाए
किसी अधिकारी का ईमानदार होना निश्चित रूप से अच्छी बात है। किसी अधिकारी का राजनीतिक या सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर कानून के मुताबिक काम करना भी प्रशंसनीय है। लेकिन क्या हमें यह पूछने की जरूरत नहीं है कि आखिर ऐसी सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां हमें असाधारण क्यों दिखाई देने लगी हैं?
शायद इसलिए कि हमने लंबे समय में व्यवस्था से अपनी अपेक्षाएं इतनी कम कर ली हैं कि जो सामान्य होना चाहिए, वही हमें असाधारण लगने लगा है।
एक नागरिक शिकायत करता है—उसे उम्मीद रहती है कि शायद कार्रवाई नहीं होगी।
किसी सरकारी कार्यालय में काम पड़ता है—उसे पहले से अंदाजा होता है कि प्रक्रिया लंबी होगी।
नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है—मन में यह सवाल आता है कि क्या उसके खिलाफ वास्तव में कार्रवाई होगी?
और जब कोई अधिकारी इन आशंकाओं को गलत साबित करता है, तो हमें आश्चर्य होता है।
हम कहते हैं—
“देखिए, अधिकारी हो तो ऐसा।”
लेकिन सवाल यह होना चाहिए—
“अधिकारी ऐसा ही क्यों नहीं होना चाहिए?”
समस्या ईमानदार अधिकारी नहीं, असामान्य बनी ईमानदारी है
यह लेख किसी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की आलोचना नहीं है। बल्कि इसके उलट—ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान और हीरोइज़्म में फर्क है।
एक डॉक्टर अपने मरीज का इलाज ईमानदारी से करता है, एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पूरी जिम्मेदारी से पढ़ाता है, एक न्यायाधीश कानून के अनुसार फैसला करता है—इन सबके लिए समाज सम्मान व्यक्त कर सकता है।
लेकिन अगर हर बार अपना मूल कर्तव्य निभाना ही असाधारण उपलब्धि बन जाए, तो हमें व्यक्ति से ज्यादा उस व्यवस्था को देखना चाहिए जिसने इस स्थिति को जन्म दिया है।
क्योंकि एक स्वस्थ व्यवस्था अपने अच्छे कर्मचारियों को हीरो बनाने पर निर्भर नहीं करती। वह ऐसी व्यवस्था बनाती है जिसमें अच्छा काम करना सामान्य हो।
क्या कानून व्यक्ति से चलता है?
यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है। अगर किसी शहर, जिले या विभाग में कानून तभी प्रभावी ढंग से लागू होता है जब कोई “सख्त” अधिकारी वहां तैनात हो, तो क्या वास्तव में कानून मजबूत है?
कानून की ताकत किसी एक अधिकारी के व्यक्तित्व पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अधिकारी बदल जाए, लेकिन नियमों का पालन और कार्रवाई की प्रक्रिया न बदले। आज एक अधिकारी सख्त है तो कार्रवाई हो रही है। कल वह स्थानांतरित हो गया तो क्या होगा?
अगर व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है, तो इसका अर्थ है कि हमने समस्या का संस्थागत समाधान नहीं किया। हमने सिर्फ एक व्यक्ति पर उम्मीद टिका दी।
लोकतंत्र व्यक्तियों की ईमानदारी से नहीं, संस्थाओं की मजबूती से चलता है। ईमानदार अधिकारी व्यवस्था को मजबूत कर सकता है, लेकिन वह अकेले व्यवस्था नहीं बन सकता।
हमें “सख्त अधिकारी” क्यों चाहिए?
यह भी सोचने वाली बात है कि हम अक्सर अच्छे अधिकारियों की पहचान “सख्त” होने से करते हैं।
सख्त अधिकारी।
ईमानदार अधिकारी।
निडर अधिकारी।
तुरंत कार्रवाई करने वाला अधिकारी।
यह शब्द अपने आप में बताते हैं कि हमारे मन में सामान्य अधिकारी की छवि कैसी बन चुकी है। क्या सामान्य अधिकारी का अर्थ हमारे लिए ऐसा व्यक्ति हो गया है जो फाइल आगे बढ़ाने में समय लेता है, शिकायत को टालता है, नियमों के बावजूद कार्रवाई से बचता है और जिम्मेदारी किसी दूसरे विभाग पर डाल देता है?
अगर ऐसा है तो समस्या कुछ अधिकारियों की नहीं, प्रशासनिक संस्कृति की है।
नागरिक भी इस संस्कृति का हिस्सा हैं
सारा दोष सरकारी तंत्र पर डालना भी आसान रास्ता है। समाज को भी खुद से सवाल करना होगा।
हममें से कितने लोग नियमों का पालन सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि पकड़े जाने का डर है?
कितने लोग चाहते हैं कि नियम उनके लिए थोड़े लचीले रहें?
कितने लोग अपने काम के लिए “जान-पहचान” या “सिफारिश” को सामान्य मानते हैं?
कितने लोग भ्रष्टाचार को गलत तो कहते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर उसे स्वीकार कर लेते हैं?
व्यवस्था और समाज अलग-अलग चीजें नहीं हैं। जिस समाज में नियमों को बाधा समझा जाता है, वहां नियम लागू करने वाला अधिकारी अक्सर कठोर दिखाई देगा। और जिस समाज में कानून को अधिकार और जिम्मेदारी दोनों के रूप में स्वीकार किया जाता है, वहां कानून लागू करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया होगी।
असली आदर्श क्या होना चाहिए?
हमें टुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की जरूरत है। लेकिन हमारा आदर्श यह नहीं होना चाहिए कि हर विभाग में एक ऐसा अधिकारी खोजा जाए जो अकेले व्यवस्था को ठीक कर दे। हमारा आदर्श इससे बड़ा होना चाहिए।
हमें ऐसी संस्थाएं चाहिए जहां—
अधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले।
राजनीतिक और बाहरी दबाव के बावजूद नियम लागू किए जा सकें।
कार्रवाई व्यक्ति की इच्छा पर नहीं, स्पष्ट प्रक्रिया पर निर्भर हो।
लापरवाही की जवाबदेही तय हो।
ईमानदार अधिकारी को असामान्य नहीं, सामान्य माना जाए।
और अधिकारी के स्थानांतरण के साथ व्यवस्था की कार्यप्रणाली न बदल जाए।
क्योंकि अगर एक अधिकारी के जाने से पूरा सिस्टम बदल जाता है, तो समस्या अधिकारी में नहीं, सिस्टम में है।
हीरो नहीं, जवाबदेह व्यवस्था
टुकाराम मुंडे की तरह कोई अधिकारी जब अपनी जिम्मेदारी निभाता है तो उसकी सराहना करना गलत नहीं है। गलती तब होगी जब हम उस सराहना को व्यवस्था की सफलता मान लें।
किसी अधिकारी का अच्छा काम हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि ऐसा काम हर अधिकारी से अपेक्षित क्यों नहीं है?
हमें ऐसे अधिकारियों को देखकर सिर्फ तालियां नहीं बजानी चाहिए। हमें यह भी पूछना चाहिए कि जो अधिकारी अपना कर्तव्य नहीं निभाते, उनके लिए जवाबदेही की व्यवस्था क्या है?
क्योंकि एक लोकतंत्र में नागरिक का अधिकार किसी अधिकारी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
कानून इसलिए लागू नहीं होना चाहिए कि अधिकारी ईमानदार है। कानून इसलिए लागू होना चाहिए क्योंकि वह कानून है।
और जनता को इसलिए न्याय नहीं मिलना चाहिए कि उसे कोई “अच्छा अधिकारी” मिल गया। न्याय मिलना चाहिए क्योंकि वह उसका अधिकार है। यही फर्क है एक अच्छे अधिकारी और एक अच्छी व्यवस्था के बीच। अच्छा अधिकारी व्यवस्था की कमी को कुछ समय के लिए भर सकता है। लेकिन अच्छी व्यवस्था को किसी हीरो की जरूरत नहीं होती।
शायद इसलिए टुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल उनकी तारीफ नहीं, बल्कि वह आईना है जो वे हमारे सामने रखते हैं।
क्या किसी अधिकारी का सिर्फ अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाना आज हमें "heroism" लगने लगा है?
अगर हाँ, तो सवाल उस अधिकारी से कम और हमसे ज्यादा है।
सवाल यह नहीं कि एक अधिकारी इतना अच्छा क्यों है। सवाल यह है कि अच्छा अधिकारी होना इतना असामान्य क्यों हो गया है?


