top of page

लोकतंत्र को भक्त नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए।

Writer: Editorial Team - उठते सवाल
Editorial Team - उठते सवाल
Jul 28
3 min read

Updated: Aug 26

लोकतंत्र - संविधान - नागरिक - जवाबदेही - समाज - राजनीति


लोकतंत्र में जागरूक नागरिक और सवाल पूछने के अधिकार पर संपादकीय
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक बिना भय के सवाल पूछते हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी तब शुरू होती है, जब चुने हुए प्रतिनिधियों को जनता का सेवक नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्तित्व मान लिया जाता है जिस पर प्रश्न उठाना ही गलत समझा जाए। किसी भी देश में यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय हो सकती है।


समर्थन करना लोकतंत्र का अधिकार है। किसी नेता, दल या विचारधारा से सहमत होना भी स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब यह विश्वास बन जाए कि एक पक्ष हमेशा सही है और बाकी सभी केवल देश का नुकसान करना चाहते हैं।


ऐसी सोच समाज को दो हिस्सों में बाँट देती है — एक तरफ "देशभक्त" और दूसरी तरफ "देशविरोधी"। जबकि लोकतंत्र में नागरिकों की पहचान उनके सवालों से नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से होती है।


क्या सरकार से सवाल पूछना राष्ट्रविरोध है?


यदि किसी नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, पर्यावरण, कर व्यवस्था या किसी सरकारी नीति पर प्रश्न हैं, तो क्या वह राष्ट्रविरोधी हो जाता है?


लोकतंत्र का उत्तर है — नहीं।


सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। इसलिए नीतियों, निर्णयों और प्रशासनिक कार्यों पर प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। प्रश्न व्यवस्था को कमजोर नहीं करते। सही प्रश्न व्यवस्था को बेहतर बनने का अवसर देते हैं।


देश और सरकार समान नहीं हैं


सरकारें समय के साथ बदलती रहती हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। लेकिन देश, संविधान और उसके नागरिक स्थायी होते हैं। इसलिए किसी सरकार की आलोचना को देश की आलोचना मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उसी प्रकार किसी सरकार के अच्छे कार्यों की सराहना करना भी गलत नहीं है।


परिपक्व लोकतंत्र वही है जहाँ प्रशंसा और आलोचना—दोनों के लिए समान स्थान हो।


लोकतंत्र में अंधविश्वास नहीं, जवाबदेही आवश्यक है


जब किसी नेता या दल को आलोचना से ऊपर मान लिया जाता है, तब धीरे-धीरे जवाबदेही कमजोर होने लगती है।


  • यदि हर निर्णय को बिना विचार स्वीकार कर लिया जाए, तो गलतियों की पहचान कौन करेगा?

  • यदि हर प्रश्न को साज़िश कहा जाए, तो सुधार कैसे होगा?

  • और यदि हर असहमति को राष्ट्रविरोध कहा जाए, तो लोकतंत्र में संवाद कैसे बचेगा?


लोकतंत्र की आत्मा सहमति से नहीं, बल्कि असहमति को सुनने की क्षमता से मजबूत होती है।


अंधविरोध भी उतना ही नुकसानदायक है


जितनी हानिकारक अंधभक्ति है, उतना ही हानिकारक अंधविरोध भी है। यदि कोई व्यक्ति किसी दल या नेता के हर निर्णय का बिना सोचे समर्थन करता है, तो वह लोकतांत्रिक विवेक खो देता है। और यदि कोई व्यक्ति बिना तथ्यों के हर निर्णय का विरोध करता है, तो वह भी निष्पक्षता से दूर चला जाता है। जिम्मेदार नागरिक वह है जो तथ्यों के आधार पर हर मुद्दे का अलग-अलग मूल्यांकन करे।


लोकतंत्र का सबसे बड़ा धर्म


लोकतंत्र किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं चलता। वह संविधान, संस्थाओं और जागरूक नागरिकों पर चलता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में नेताओं का सम्मान होता है, लेकिन उन्हें प्रश्नों से ऊपर नहीं माना जाता। सम्मान और जवाबदेही साथ-साथ चल सकते हैं। वास्तव में, जो नेतृत्व जनता के प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हो, वही लोकतांत्रिक नेतृत्व कहलाने का सबसे बड़ा अधिकारी है।


निष्कर्ष


जब समाज यह मानने लगता है कि केवल एक विचार सही है, केवल एक नेतृत्व देशभक्त है और केवल एक आवाज़ राष्ट्रहित की प्रतिनिधि है, तब लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ने लगता है।


लोकतंत्र का भविष्य किसी एक नेता, एक दल या एक विचारधारा पर नहीं, बल्कि उन नागरिकों पर निर्भर करता है जो बिना भय, बिना घृणा और बिना अंधविश्वास के प्रश्न पूछते हैं, तथ्यों को परखते हैं और अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही की अपेक्षा रखते हैं।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति कोई नेता नहीं होता — सबसे शक्तिशाली होता है जागरूक नागरिक।

bottom of page