top of page

क्या रोबोट का “प्रदर्शन” जीवित प्राणियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है?

  • Prakhar Tiwari
  • 3 hours ago
  • 2 min read

दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit के दौरान Galgotias University ने एक रोबोट डॉग को अपने इनोवेशन के रूप में प्रस्तुत किया। वीडियो वायरल हुआ, तो सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई उपयोगकर्ताओं और फैक्ट-चेकर्स ने दावा किया कि यह रोबोट वास्तव में चीन की कंपनी Unitree Robotics का मॉडल है - विशेष रूप से Unitree Go2 - जो बाजार में उपलब्ध एक रेडीमेड प्रोडक्ट है।


समिट में यूनिवर्सिटी प्रतिनिधि ने रोबोट का नाम “ओरियन” बताते हुए कहा कि यह उनके Centre of Excellence में विकसित किया गया है। साथ ही यह भी दावा किया गया कि यूनिवर्सिटी ₹350 करोड़ के AI इकोसिस्टम निवेश की दिशा में अग्रसर है। हालांकि विवाद बढ़ने पर यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर सफाई दी कि उन्होंने इस रोबोट को स्वयं विकसित करने का दावा नहीं किया था, बल्कि इसे छात्रों के शिक्षण और प्रयोग के उद्देश्य से खरीदा गया है।


यदि हम यह मान भी लें कि रोबोट को शैक्षणिक प्रयोग और तकनीकी प्रशिक्षण के लिए खरीदा गया हो, तब भी एक नैतिक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है।


कुछ महीनों पूर्व इसी शिक्षण संस्थान पर आरोप लगे थे कि उसने परिसर के आसपास रहने वाले देशी नस्ल के जीवित कुत्तों को गैरकानूनी तरीके से हटवा दिया।



यदि यह सत्य है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। एक ओर विदेशी रोबोटिक कुत्ते को “नवाचार” और “भविष्य की तकनीक” का प्रतीक बनाकर मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, वहीं दूसरी ओर जीवित प्राणियों को परिसर से बाहर कर दिया जाता है।


यह केवल एक संस्थान की भूल या विवाद भर नहीं है - यह हमारे समय का दार्शनिक प्रश्न है।


क्या हम ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ संवेदनशील, जीवित प्राणियों की अपेक्षा मशीनें अधिक मूल्यवान प्रतीत होने लगी हैं? क्या शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता देना रह गया है, या उन्हें संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और करुणा जैसे मूल्यों का भी संरक्षण करना चाहिए?


तकनीक का विकास आवश्यक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन भविष्य की वास्तविकताएँ हैं। परंतु क्या तकनीकी प्रगति मानवता और जीवों के प्रति दायित्व से ऊपर हो सकती है?


विद्यार्थी केवल मशीनों से नहीं सीखते - वे वातावरण से सीखते हैं। वे सहानुभूति, जिम्मेदारी और जीवन के मूल सिद्धांत भी अपने आसपास के अनुभवों से ग्रहण करते हैं। यदि किसी परिसर में जीवित प्राणियों के लिए स्थान नहीं है, तो क्या वहाँ मानवीय मूल्यों के लिए भी पर्याप्त स्थान बचा है?


आज सवाल केवल एक रोबोट डॉग का नहीं है। सवाल यह है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं - एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ तकनीक सर्वोच्च है, या एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ तकनीक और संवेदनशीलता साथ-साथ चलें?


शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने की जगह नहीं होते, वे समाज की दिशा तय करते हैं। ऐसे में उन्हें यह तय करना होगा कि भविष्य की पीढ़ियों को वे किस प्रकार का भारत सौंपना चाहते हैं - मशीनों से समृद्ध, या मूल्यों से संपन्न?

bottom of page