top of page

MP Budget 2026: ‘यशोदा’ और ‘द्वारिका’ के नाम पर चमक, पर क्या बुझेंगे बुनियादी अभावों के सवाल?

Writer: News Desk - उठते सवाल
News Desk - उठते सवाल
Mar 5
3 min read

Updated: Aug 26

MP Budget 2026 - Yashoda Milk Supply Scheme - Dwarka Dwar Yojana


MP Budget 2026 - Yashoda Milk Supply Scheme - Dwarka Dwar Yojana - Uthte Sawal - उठते सवाल

मध्य प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹4.38 लाख करोड़ का बजट पेश किया है। लेकिन इस बार चर्चा MP Budget 2026 के आकार से ज्यादा उन दो नामों की हो रही है, जिन्हें सरकार ने अपनी फ्लैगशिप योजनाओं से जोड़ा है— ‘यशोदा’ और ‘द्वारिका’


राजनीतिक हलकों में ‘सांस्कृतिक गौरव’ बनाम ‘संवैधानिक मर्यादा’ की बहस तेज है। मगर एक जिम्मेदार पत्रकारिता के लिए असली प्रश्न यह है— क्या योजनाओं का ‘दिव्य’ नामकरण प्रदेश की उन जमीनी समस्याओं को हल कर पाएगा, जिनसे जनता दशकों से जूझ रही है?


यशोदा दुग्ध योजना: कुपोषण पर नाम का मरहम या ठोस बदलाव?


सरकार ने घोषणा की है कि प्रदेश के 1.46 करोड़ बच्चों को आंगनवाड़ी और मिड-डे मील के माध्यम से दूध उपलब्ध कराया जाएगा। इसे ‘यशोदा योजना’ नाम दिया गया है— एक ऐसा नाम जो मातृत्व, पोषण और स्नेह का प्रतीक माना जाता है।


प्रदेश आज भी बच्चों में कुपोषण की चुनौती से जूझ रहा है। क्या केवल नाम बदलने से सप्लाई चेन की कमियां और भ्रष्टाचार दूर हो जाएंगे?

पहले भी दूध वितरण योजनाएं मिलावट, देरी और निगरानी की कमी के कारण कमजोर पड़ीं। क्या इस बार ट्रैकिंग, गुणवत्ता जांच और सामाजिक ऑडिट जैसी ठोस व्यवस्थाएं लागू होंगी? क्या सरकार सार्वजनिक डैशबोर्ड पर यह बताएगी कि किस जिले में कितना दूध पहुंचा और कितने बच्चों को वास्तविक लाभ मिला?


यदि व्यवस्था पारदर्शी और जवाबदेह नहीं हुई, तो ‘यशोदा’ केवल एक भावनात्मक प्रतीक बनकर रह जाएगी।


द्वारिका नगर योजना: भव्यता बनाम बुनियादी सुविधाएं


शहरी विकास के लिए ₹5,000 करोड़ की ‘द्वारिका नगर योजना’ घोषित की गई है। तर्क है— शहरों को आधुनिक और भव्य स्वरूप देना।


जब स्वच्छता के लिए कई बार राष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए शहरों में भी पेयजल और सीवेज जैसी बुनियादी समस्याएं सामने आती हैं, तो क्या सौंदर्यीकरण प्राथमिकता होनी चाहिए?

क्या यह राशि केवल वीआईपी रोड, सिग्नेचर लाइटिंग और पॉश इलाकों के विकास तक सीमित रहेगी? क्या झुग्गी-बस्तियों, पुरानी कॉलोनियों और अव्यवस्थित वार्डों में पानी, नाली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं पर समान ध्यान दिया जाएगा?


अगर ‘द्वारिका’ का अर्थ केवल चमक-दमक रह गया, तो अंधेरे मोहल्ले फिर भी अंधेरे ही रहेंगे।


कर्ज का दबाव और ब्रांडिंग की राजनीति


प्रदेश पर कुल कर्ज ₹4 लाख करोड़ से अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में राजकोषीय अनुशासन का प्रश्न स्वाभाविक है।


जब ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है, तब करोड़ों की ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार पर खर्च क्या प्राथमिकता होनी चाहिए?

क्या धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे योजनाओं की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश प्रशासनिक जवाबदेही से ध्यान हटाने का तरीका तो नहीं? क्या विकास को किसी एक भावनात्मक आख्यान से जोड़ना लोकतांत्रिक विविधता के अनुरूप है?


नाम नहीं, नीयत की परीक्षा


प्रशासनिक दुनिया में कहा जाता है— “फाइलें नाम से नहीं, नीयत और निष्पादन से चलती हैं।” ‘यशोदा’ और ‘द्वारिका’ जैसे नाम सांस्कृतिक रूप से आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन असली कसौटी ज़मीन पर दिखने वाला बदलाव है।


जनता अब प्रतीकों से आगे बढ़ चुकी है। वह पूछ रही है—


  • क्या ‘द्वारिका’ योजना के बाद गड्ढों से भरी सड़कें दुरुस्त होंगी?

  • क्या ‘यशोदा’ योजना के बाद बच्चों का कुपोषण वास्तव में घटेगा?

  • क्या बजट की हर घोषणा का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट होगा?


अगर जवाब सकारात्मक और पारदर्शी है, तो ये नाम सार्थक सिद्ध होंगे।

अगर नहीं, तो वे केवल विज्ञापनों की सुर्खियां बनकर रह जाएंगे।


हमारा प्रश्न सरल है— विकास भले ही दिव्य कहलाए, पर क्या वह ईमानदार और जवाबदेह होगा?

bottom of page