₹8,452 करोड़ का PM CARES FUND... आपके भरोसे से जमा हुआ पैसा आखिर कब, कहाँ, कैसे और किसके लिए खर्च हुआ?

Updated: Aug 22
PM CARES Fund का corpus 31 मार्च 2025 तक ₹8,452 करोड़ पहुंच गया, लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में खर्च सिर्फ ₹87.85 लाख हुआ। हजारों करोड़ के इस फंड, बड़े पैमाने पर FD में रखी राशि और ₹324 करोड़ से अधिक के refunds के बीच सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है।

कोरोना महामारी के दौरान जब देश अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा था, तब एक अपील की गई—देश के नागरिक संकट की इस घड़ी में अपना योगदान दें। इसी उद्देश्य से 2020 में PM CARES Fund बनाया गया। आज छह साल बाद इस फंड की तस्वीर एक असहज सवाल खड़ा करती है। 31 मार्च 2025 तक PM CARES Fund का corpus ₹8,452.07 करोड़ पहुंच चुका था। लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में इस फंड से खर्च हुआ सिर्फ ₹87.85 लाख।
एक तरफ हजारों करोड़ रुपये का फंड। दूसरी तरफ पूरे साल में एक करोड़ रुपये से भी कम खर्च। सवाल उठना स्वाभाविक है—इतना बड़ा emergency fund आखिर किसलिए है और जरूरत के समय इसका इस्तेमाल किस आधार पर किया जाता है?

₹8,452 करोड़ का फंड, 93% रकम FD में
31 मार्च 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक PM CARES Fund की करीब ₹7,846.65 करोड़ राशि Fixed Deposits में थी—यानी कुल corpus का लगभग 93 प्रतिशत। FD में पैसा रखना अपने आप में गलत नहीं है। किसी फंड की राशि को सुरक्षित रखना और उस पर ब्याज अर्जित करना वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यहां सवाल कुछ और है।
PM CARES Fund की स्थापना ही emergency या distress situation में राहत और सहायता के उद्देश्य से हुई थी। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य public-health emergency, प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा तथा अन्य संकटों में प्रभावित लोगों को सहायता देना है। तो सवाल है—क्या ₹8,452 करोड़ के corpus में से एक साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च होना उस उद्देश्य के अनुरूप है?
पूरे साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च
FY 2024-25 में फंड से कुल expenditure ₹87.85 लाख रहा। इसमें लगभग पूरी राशि PM CARES for Children Scheme के लिए गई। यानी उस पूरे वित्त वर्ष में फंड के कुल corpus की तुलना में इस्तेमाल बेहद छोटा रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह closing balance का लगभग 0.01 प्रतिशत है। यह आंकड़ा अपने आप में किसी वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं है।
लेकिन यह एक महत्वपूर्ण public-interest question जरूर है: अगर emergency fund का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो क्या इसलिए कि उस अवधि में ऐसी जरूरत नहीं थी? या सहायता जारी करने की प्रक्रिया और मानदंड इतने सीमित हैं कि बड़ा corpus निष्क्रिय पड़ा रहता है?
जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि जवाब क्या है।
₹324 करोड़ से ज्यादा वापस भी आए
इस वित्तीय विवरण में एक और आंकड़ा ध्यान खींचता है। FY 2024-25 में PM CARES Fund को ₹324.66 करोड़ से अधिक refunds प्राप्त हुए। यह रकम किन संस्थाओं या implementing agencies से आई? किस परियोजना या उद्देश्य के लिए पहले जारी हुई थी? कितनी राशि खर्च हुई और कितनी वापस की गई? राशि वापस करने की जरूरत क्यों पड़ी?
ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि refund अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन इतनी बड़ी राशि के refund का पूरा विवरण सार्वजनिक होना पारदर्शिता को मजबूत करता है।
फंड में पैसा कम नहीं हो रहा
दिलचस्प बात यह भी है कि corpus बढ़ा है, जबकि donations में गिरावट आई। FY 2024-25 में domestic donations करीब ₹479 करोड़ रहीं, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में कम थीं। इसके बावजूद corpus बढ़कर ₹8,452 करोड़ पहुंच गया। इसकी एक वजह interest income और refunds रहे। यानी पैसा सिर्फ जमा नहीं हो रहा, उसका एक बड़ा हिस्सा FD में रखकर ब्याज भी अर्जित कर रहा है।
लेकिन यहां फिर वही सवाल लौटता है—क्या emergency fund की सफलता उसका बड़ा corpus है या संकट के समय उस धन का प्रभावी और पारदर्शी इस्तेमाल?
RTI का सवाल सबसे महत्वपूर्ण है
PM CARES Fund को लेकर सबसे गंभीर सवाल सिर्फ expenditure का नहीं, बल्कि transparency और RTI का है। सरकार PM CARES को एक Public Charitable Trust बताती है। PM CARES की आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री इसके ex-officio Chairman हैं और Defence, Home तथा Finance Ministers ex-officio Trustees हैं। Fund में budgetary support नहीं मिलता और यह individuals तथा organizations के voluntary contributions से चलता है।
यहीं एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। Fund का कानूनी स्वरूप एक public charitable trust है, लेकिन उसका नेतृत्व देश के प्रधानमंत्री और तीन केंद्रीय मंत्रियों के हाथों में है। और PM CARES से संबंधित RTI requests के मामले में यह स्थिति सामने आती रही है कि Fund स्वयं को RTI Act के तहत “public authority” नहीं मानता।
इसका अर्थ यह नहीं कि PM CARES की सारी जानकारी बिल्कुल भी सार्वजनिक नहीं है। Fund अपनी वेबसाइट पर audited financial statements और अन्य जानकारियां प्रकाशित करता है।
लेकिन सवाल यह है कि—क्या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी और RTI के तहत नागरिक को सूचना मांगने का अधिकार—दोनों एक ही बात हैं?
नहीं। वेबसाइट पर जो जानकारी संस्था स्वयं सार्वजनिक करना चाहे, वह एक बात है।
और नागरिक का यह अधिकार कि वह सवाल पूछे—“इस राशि का उपयोग किस परियोजना के लिए हुआ?”“किस संस्था को कितना पैसा दिया गया?”“कितना पैसा वापस आया और क्यों?”
—यह दूसरी बात है।
इसीलिए PM CARES की transparency पर बहस सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल है।
सरकारी बजट का पैसा नहीं—लेकिन जनता का भरोसा जरूर है
यहां एक तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है। PM CARES को सरकारी बजट से वित्तीय सहायता नहीं मिलती। सरकार इसे voluntary contributions से संचालित Fund बताती है। इसलिए इसे सीधे-सीधे “सरकारी खजाने का पैसा” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि इसके पैसे और फैसलों पर सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल खत्म हो जाता है?
शायद नहीं।
क्योंकि यह पैसा नागरिकों और संस्थानों से उस अपील के साथ लिया गया कि यह राष्ट्र के संकट में काम आएगा। और जब कोई नागरिक संकट के समय अपनी कमाई का हिस्सा किसी राष्ट्रीय राहत कोष में देता है, तो वह केवल पैसे का योगदान नहीं करता। वह भरोसा देता है।
इसलिए सवाल उस भरोसे की पारदर्शिता का है।
PM CARES बनाम PMO: दूरी कितनी?
PM CARES का प्रशासनिक संबंध भी सवालों को और महत्वपूर्ण बनाता है। प्रधानमंत्री कार्यालय स्वयं बताता है कि PMO प्रधानमंत्री को secretarial assistance देता है और वहां सरकारी अधिकारी काम करते हैं। दूसरी ओर PM CARES की आधिकारिक जानकारी में प्रधानमंत्री और तीन केंद्रीय मंत्रियों की trustee के रूप में भूमिका स्पष्ट है।
ऐसी स्थिति में आम नागरिक के लिए यह सवाल स्वाभाविक है—जब Fund का नेतृत्व सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे लोग करते हैं, तो उसके कामकाज की सार्वजनिक जवाबदेही का स्तर भी उसी अनुपात में स्पष्ट और मजबूत क्यों न हो?
यह सवाल PM CARES के अस्तित्व पर सवाल नहीं है। यह accountability की कसौटी पर सवाल है।
सवाल खर्च कम होने का ही नहीं है
₹87.85 लाख का expenditure देखकर केवल यह कहना आसान है कि “इतना कम खर्च क्यों हुआ?”
लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है।
₹8,452 करोड़ के corpus के बावजूद expenditure इतना कम क्यों रहा?
₹7,846 करोड़ से ज्यादा राशि FD में रखने की रणनीति क्या है?
₹324.66 करोड़ से अधिक refunds किन परियोजनाओं या agencies से आए?
उन refunds का विस्तृत विवरण सार्वजनिक क्यों न हो?
Fund से सहायता जारी करने के criteria क्या हैं?
कितने applications या proposals आए और कितनों को मंजूरी मिली?
कितनी राशि किस उद्देश्य से जारी की गई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नागरिक PM CARES से सीधे RTI के माध्यम से इन सवालों के जवाब मांग सकता है?
इनमें से किसी सवाल को राजनीतिक आरोप मानकर खारिज करना आसान है। लेकिन यही तो लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम है—आंकड़े सामने रखना और उनसे उठने वाले सवाल पूछना।
बड़ा सवाल: पैसा सुरक्षित है या जवाबदेह?
PM CARES के पास पैसा है। बहुत पैसा है। वह पैसा largely सुरक्षित financial instruments में रखा गया है और उस पर interest भी मिल रहा है। Fund का corpus बढ़ रहा है। लेकिन किसी emergency fund की असली परीक्षा उसके corpus की ऊंचाई से नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है जब देश या समाज किसी संकट में हो।
तब सवाल होता है—
पैसा कितनी जल्दी उपलब्ध हुआ?
किसे मिला?
किस आधार पर मिला?
कितना मिला?
और जनता इन फैसलों की स्वतंत्र रूप से जांच कैसे कर सकती है?
यही वह जगह है जहां पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हो जाती है।
सवाल तो उठेंगे
PM CARES Fund बनाना गलत है या सही—यह इस लेख का सवाल नहीं है। फंड में पैसा होना भी समस्या नहीं है। FD में पैसा रखना भी अपने आप में समस्या नहीं है। और कम खर्च होना भी अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है।
लेकिन जब ₹8,452 करोड़ का emergency corpus हो, एक साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च हुए हों, ₹324 करोड़ से ज्यादा refunds आए हों और Fund की RTI के तहत स्थिति पर सवाल मौजूद हों—तो सार्वजनिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता ने इस Fund में पैसा केवल इसलिए नहीं दिया था कि वह बैंक खाते में सुरक्षित रहे। उसने इसलिए दिया था कि संकट के समय यह देश के काम आए।

और जिसने भरोसा दिया है, उसे यह पूछने का अधिकार भी होना चाहिए—
“मेरे भरोसे से जमा हुए इस पैसे का इस्तेमाल कब, कहाँ, कैसे और किसके लिए हुआ?”
क्योंकि लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई एहसान नहीं—जवाबदेही की बुनियादी शर्त है।
सवाल तो उठेंगे।


