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  • ₹8,452 करोड़ का PM CARES FUND... आपके भरोसे से जमा हुआ पैसा आखिर कब, कहाँ, कैसे और किसके लिए खर्च हुआ?

    PM CARES Fund का corpus 31 मार्च 2025 तक ₹8,452 करोड़ पहुंच गया, लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में खर्च सिर्फ ₹87.85 लाख हुआ। हजारों करोड़ के इस फंड, बड़े पैमाने पर FD में रखी राशि और ₹324 करोड़ से अधिक के refunds के बीच सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है। कोरोना महामारी के दौरान जब देश अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा था, तब एक अपील की गई—देश के नागरिक संकट की इस घड़ी में अपना योगदान दें। इसी उद्देश्य से 2020 में PM CARES Fund बनाया गया। आज छह साल बाद इस फंड की तस्वीर एक असहज सवाल खड़ा करती है। 31 मार्च 2025 तक PM CARES Fund का corpus ₹8,452.07 करोड़ पहुंच चुका था। लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में इस फंड से खर्च हुआ सिर्फ ₹87.85 लाख। एक तरफ हजारों करोड़ रुपये का फंड। दूसरी तरफ पूरे साल में एक करोड़ रुपये से भी कम खर्च। सवाल उठना स्वाभाविक है—इतना बड़ा emergency fund आखिर किसलिए है और जरूरत के समय इसका इस्तेमाल किस आधार पर किया जाता है? PM CARES Audited Statement 2024-25 | Source: https://pmcares.gov.in/en/web/page/about_us ₹8,452 करोड़ का फंड, 93% रकम FD में 31 मार्च 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक PM CARES Fund की करीब ₹7,846.65 करोड़ राशि Fixed Deposits में थी—यानी कुल corpus का लगभग 93 प्रतिशत। FD में पैसा रखना अपने आप में गलत नहीं है। किसी फंड की राशि को सुरक्षित रखना और उस पर ब्याज अर्जित करना वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यहां सवाल कुछ और है। PM CARES Fund की स्थापना ही emergency या distress situation में राहत और सहायता के उद्देश्य से हुई थी। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य public-health emergency, प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा तथा अन्य संकटों में प्रभावित लोगों को सहायता देना है। तो सवाल है—क्या ₹8,452 करोड़ के corpus में से एक साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च होना उस उद्देश्य के अनुरूप है? पूरे साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च FY 2024-25 में फंड से कुल expenditure ₹87.85 लाख रहा। इसमें लगभग पूरी राशि PM CARES for Children Scheme के लिए गई। यानी उस पूरे वित्त वर्ष में फंड के कुल corpus की तुलना में इस्तेमाल बेहद छोटा रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह closing balance का लगभग 0.01 प्रतिशत है। यह आंकड़ा अपने आप में किसी वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण public-interest question जरूर है: अगर emergency fund का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो क्या इसलिए कि उस अवधि में ऐसी जरूरत नहीं थी? या सहायता जारी करने की प्रक्रिया और मानदंड इतने सीमित हैं कि बड़ा corpus निष्क्रिय पड़ा रहता है? जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि जवाब क्या है। ₹324 करोड़ से ज्यादा वापस भी आए इस वित्तीय विवरण में एक और आंकड़ा ध्यान खींचता है। FY 2024-25 में PM CARES Fund को ₹324.66 करोड़ से अधिक refunds प्राप्त हुए। यह रकम किन संस्थाओं या implementing agencies से आई? किस परियोजना या उद्देश्य के लिए पहले जारी हुई थी? कितनी राशि खर्च हुई और कितनी वापस की गई? राशि वापस करने की जरूरत क्यों पड़ी? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि refund अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन इतनी बड़ी राशि के refund का पूरा विवरण सार्वजनिक होना पारदर्शिता को मजबूत करता है। फंड में पैसा कम नहीं हो रहा दिलचस्प बात यह भी है कि corpus बढ़ा है, जबकि donations में गिरावट आई। FY 2024-25 में domestic donations करीब ₹479 करोड़ रहीं, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में कम थीं। इसके बावजूद corpus बढ़कर ₹8,452 करोड़ पहुंच गया। इसकी एक वजह interest income और refunds रहे। यानी पैसा सिर्फ जमा नहीं हो रहा, उसका एक बड़ा हिस्सा FD में रखकर ब्याज भी अर्जित कर रहा है। लेकिन यहां फिर वही सवाल लौटता है—क्या emergency fund की सफलता उसका बड़ा corpus है या संकट के समय उस धन का प्रभावी और पारदर्शी इस्तेमाल? RTI का सवाल सबसे महत्वपूर्ण है PM CARES Fund को लेकर सबसे गंभीर सवाल सिर्फ expenditure का नहीं, बल्कि transparency और RTI का है। सरकार PM CARES को एक Public Charitable Trust बताती है। PM CARES की आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री इसके ex-officio Chairman हैं और Defence, Home तथा Finance Ministers ex-officio Trustees हैं। Fund में budgetary support नहीं मिलता और यह individuals तथा organizations के voluntary contributions से चलता है। यहीं एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। Fund का कानूनी स्वरूप एक public charitable trust है, लेकिन उसका नेतृत्व देश के प्रधानमंत्री और तीन केंद्रीय मंत्रियों के हाथों में है। और PM CARES से संबंधित RTI requests के मामले में यह स्थिति सामने आती रही है कि Fund स्वयं को RTI Act के तहत “public authority” नहीं मानता। इसका अर्थ यह नहीं कि PM CARES की सारी जानकारी बिल्कुल भी सार्वजनिक नहीं है। Fund अपनी वेबसाइट पर audited financial statements और अन्य जानकारियां प्रकाशित करता है। लेकिन सवाल यह है कि—क्या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी और RTI के तहत नागरिक को सूचना मांगने का अधिकार—दोनों एक ही बात हैं? नहीं। वेबसाइट पर जो जानकारी संस्था स्वयं सार्वजनिक करना चाहे, वह एक बात है। और नागरिक का यह अधिकार कि वह सवाल पूछे—“इस राशि का उपयोग किस परियोजना के लिए हुआ?”“किस संस्था को कितना पैसा दिया गया?”“कितना पैसा वापस आया और क्यों?” —यह दूसरी बात है। इसीलिए PM CARES की transparency पर बहस सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल है। सरकारी बजट का पैसा नहीं—लेकिन जनता का भरोसा जरूर है यहां एक तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है। PM CARES को सरकारी बजट से वित्तीय सहायता नहीं मिलती। सरकार इसे voluntary contributions से संचालित Fund बताती है। इसलिए इसे सीधे-सीधे “सरकारी खजाने का पैसा” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि इसके पैसे और फैसलों पर सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल खत्म हो जाता है? शायद नहीं। क्योंकि यह पैसा नागरिकों और संस्थानों से उस अपील के साथ लिया गया कि यह राष्ट्र के संकट में काम आएगा। और जब कोई नागरिक संकट के समय अपनी कमाई का हिस्सा किसी राष्ट्रीय राहत कोष में देता है, तो वह केवल पैसे का योगदान नहीं करता। वह भरोसा देता है। इसलिए सवाल उस भरोसे की पारदर्शिता का है। PM CARES बनाम PMO: दूरी कितनी? PM CARES का प्रशासनिक संबंध भी सवालों को और महत्वपूर्ण बनाता है। प्रधानमंत्री कार्यालय स्वयं बताता है कि PMO प्रधानमंत्री को secretarial assistance देता है और वहां सरकारी अधिकारी काम करते हैं। दूसरी ओर PM CARES की आधिकारिक जानकारी में प्रधानमंत्री और तीन केंद्रीय मंत्रियों की trustee के रूप में भूमिका स्पष्ट है। ऐसी स्थिति में आम नागरिक के लिए यह सवाल स्वाभाविक है—जब Fund का नेतृत्व सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे लोग करते हैं, तो उसके कामकाज की सार्वजनिक जवाबदेही का स्तर भी उसी अनुपात में स्पष्ट और मजबूत क्यों न हो? यह सवाल PM CARES के अस्तित्व पर सवाल नहीं है। यह accountability की कसौटी पर सवाल है। सवाल खर्च कम होने का ही नहीं है ₹87.85 लाख का expenditure देखकर केवल यह कहना आसान है कि “इतना कम खर्च क्यों हुआ?” लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है। ₹8,452 करोड़ के corpus के बावजूद expenditure इतना कम क्यों रहा? ₹7,846 करोड़ से ज्यादा राशि FD में रखने की रणनीति क्या है? ₹324.66 करोड़ से अधिक refunds किन परियोजनाओं या agencies से आए? उन refunds का विस्तृत विवरण सार्वजनिक क्यों न हो? Fund से सहायता जारी करने के criteria क्या हैं? कितने applications या proposals आए और कितनों को मंजूरी मिली? कितनी राशि किस उद्देश्य से जारी की गई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नागरिक PM CARES से सीधे RTI के माध्यम से इन सवालों के जवाब मांग सकता है? इनमें से किसी सवाल को राजनीतिक आरोप मानकर खारिज करना आसान है। लेकिन यही तो लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम है—आंकड़े सामने रखना और उनसे उठने वाले सवाल पूछना। बड़ा सवाल: पैसा सुरक्षित है या जवाबदेह? PM CARES के पास पैसा है। बहुत पैसा है। वह पैसा largely सुरक्षित financial instruments में रखा गया है और उस पर interest भी मिल रहा है। Fund का corpus बढ़ रहा है। लेकिन किसी emergency fund की असली परीक्षा उसके corpus की ऊंचाई से नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है जब देश या समाज किसी संकट में हो। तब सवाल होता है— पैसा कितनी जल्दी उपलब्ध हुआ? किसे मिला? किस आधार पर मिला? कितना मिला? और जनता इन फैसलों की स्वतंत्र रूप से जांच कैसे कर सकती है? यही वह जगह है जहां पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हो जाती है। सवाल तो उठेंगे PM CARES Fund बनाना गलत है या सही—यह इस लेख का सवाल नहीं है। फंड में पैसा होना भी समस्या नहीं है। FD में पैसा रखना भी अपने आप में समस्या नहीं है। और कम खर्च होना भी अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन जब ₹8,452 करोड़ का emergency corpus हो, एक साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च हुए हों, ₹324 करोड़ से ज्यादा refunds आए हों और Fund की RTI के तहत स्थिति पर सवाल मौजूद हों—तो सार्वजनिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता ने इस Fund में पैसा केवल इसलिए नहीं दिया था कि वह बैंक खाते में सुरक्षित रहे। उसने इसलिए दिया था कि संकट के समय यह देश के काम आए। और जिसने भरोसा दिया है, उसे यह पूछने का अधिकार भी होना चाहिए— “मेरे भरोसे से जमा हुए इस पैसे का इस्तेमाल कब, कहाँ, कैसे और किसके लिए हुआ?” क्योंकि लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई एहसान नहीं—जवाबदेही की बुनियादी शर्त है। सवाल तो उठेंगे।

  • क्या किसी अधिकारी का सिर्फ अपना कर्तव्य निभाना आज हमें Heroism लगने लगा है? | Tukaram Mundhe

    सवाल Tukaram Mundhe जैसे किसी एक अधिकारी का नहीं, उस व्यवस्था का है जहां ईमानदारी से ड्यूटी करना भी असाधारण उपलब्धि मान लिया जाता है। तुकाराम मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर के IAS अधिकारी हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र के Food & Drug Administration (FDA) के आयुक्त हैं। 25 मई 2026 को पद संभालने के बाद उन्होंने मिलावटखोरी, अस्वच्छ खाद्य प्रतिष्ठानों और खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों के खिलाफ राज्यव्यापी सख्त कार्रवाई शुरू की, जिसके बाद वे सोशल मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया में तेजी से चर्चा में आए। Tukaram Mundhe जब किसी नियम को सख्ती से लागू करते हैं, मिलावटखोरी के खिलाफ कार्रवाई करते हैं या प्रशासनिक जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाते हैं, तो उनकी चर्चा होती है। सोशल मीडिया पर उनके काम की तारीफ होती है। उन्हें सख्त, ईमानदार और निडर अधिकारी कहा जाता है। तारीफ होनी भी चाहिए। लेकिन इस तारीफ के बीच एक सवाल कहीं दब जाता है — क्या उन्होंने वास्तव में ऐसा कुछ किया, जो एक सरकारी अधिकारी के कर्तव्य से बाहर था? क्या कानून लागू करना बहादुरी है? क्या मिलावटखोरों पर कार्रवाई करना कोई असाधारण उपलब्धि है? क्या जनता के स्वास्थ्य और हितों की रक्षा करना किसी अधिकारी का अतिरिक्त प्रयास है? क्या नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना जनता पर कोई एहसान है? नहीं। यह उस अधिकारी की जिम्मेदारी है। यही बात इस पूरे विमर्श को असहज बनाती है। जब कर्तव्य “heroism” बन जाए किसी अधिकारी का ईमानदार होना निश्चित रूप से अच्छी बात है। किसी अधिकारी का राजनीतिक या सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर कानून के मुताबिक काम करना भी प्रशंसनीय है। लेकिन क्या हमें यह पूछने की जरूरत नहीं है कि आखिर ऐसी सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां हमें असाधारण क्यों दिखाई देने लगी हैं? शायद इसलिए कि हमने लंबे समय में व्यवस्था से अपनी अपेक्षाएं इतनी कम कर ली हैं कि जो सामान्य होना चाहिए, वही हमें असाधारण लगने लगा है। एक नागरिक शिकायत करता है—उसे उम्मीद रहती है कि शायद कार्रवाई नहीं होगी। किसी सरकारी कार्यालय में काम पड़ता है—उसे पहले से अंदाजा होता है कि प्रक्रिया लंबी होगी। नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है—मन में यह सवाल आता है कि क्या उसके खिलाफ वास्तव में कार्रवाई होगी? और जब कोई अधिकारी इन आशंकाओं को गलत साबित करता है, तो हमें आश्चर्य होता है। हम कहते हैं— “देखिए, अधिकारी हो तो ऐसा।” लेकिन सवाल यह होना चाहिए— “अधिकारी ऐसा ही क्यों नहीं होना चाहिए?” समस्या ईमानदार अधिकारी नहीं, असामान्य बनी ईमानदारी है यह लेख किसी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की आलोचना नहीं है। बल्कि इसके उलट—ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान और हीरोइज़्म में फर्क है। एक डॉक्टर अपने मरीज का इलाज ईमानदारी से करता है, एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पूरी जिम्मेदारी से पढ़ाता है, एक न्यायाधीश कानून के अनुसार फैसला करता है—इन सबके लिए समाज सम्मान व्यक्त कर सकता है। लेकिन अगर हर बार अपना मूल कर्तव्य निभाना ही असाधारण उपलब्धि बन जाए, तो हमें व्यक्ति से ज्यादा उस व्यवस्था को देखना चाहिए जिसने इस स्थिति को जन्म दिया है। क्योंकि एक स्वस्थ व्यवस्था अपने अच्छे कर्मचारियों को हीरो बनाने पर निर्भर नहीं करती। वह ऐसी व्यवस्था बनाती है जिसमें अच्छा काम करना सामान्य हो। क्या कानून व्यक्ति से चलता है? यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है। अगर किसी शहर, जिले या विभाग में कानून तभी प्रभावी ढंग से लागू होता है जब कोई “सख्त” अधिकारी वहां तैनात हो, तो क्या वास्तव में कानून मजबूत है? कानून की ताकत किसी एक अधिकारी के व्यक्तित्व पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अधिकारी बदल जाए, लेकिन नियमों का पालन और कार्रवाई की प्रक्रिया न बदले। आज एक अधिकारी सख्त है तो कार्रवाई हो रही है। कल वह स्थानांतरित हो गया तो क्या होगा? अगर व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है, तो इसका अर्थ है कि हमने समस्या का संस्थागत समाधान नहीं किया। हमने सिर्फ एक व्यक्ति पर उम्मीद टिका दी। लोकतंत्र व्यक्तियों की ईमानदारी से नहीं, संस्थाओं की मजबूती से चलता है। ईमानदार अधिकारी व्यवस्था को मजबूत कर सकता है, लेकिन वह अकेले व्यवस्था नहीं बन सकता। हमें “सख्त अधिकारी” क्यों चाहिए? यह भी सोचने वाली बात है कि हम अक्सर अच्छे अधिकारियों की पहचान “सख्त” होने से करते हैं। सख्त अधिकारी। ईमानदार अधिकारी। निडर अधिकारी। तुरंत कार्रवाई करने वाला अधिकारी। यह शब्द अपने आप में बताते हैं कि हमारे मन में सामान्य अधिकारी की छवि कैसी बन चुकी है। क्या सामान्य अधिकारी का अर्थ हमारे लिए ऐसा व्यक्ति हो गया है जो फाइल आगे बढ़ाने में समय लेता है, शिकायत को टालता है, नियमों के बावजूद कार्रवाई से बचता है और जिम्मेदारी किसी दूसरे विभाग पर डाल देता है? अगर ऐसा है तो समस्या कुछ अधिकारियों की नहीं, प्रशासनिक संस्कृति की है। नागरिक भी इस संस्कृति का हिस्सा हैं सारा दोष सरकारी तंत्र पर डालना भी आसान रास्ता है। समाज को भी खुद से सवाल करना होगा। हममें से कितने लोग नियमों का पालन सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि पकड़े जाने का डर है? कितने लोग चाहते हैं कि नियम उनके लिए थोड़े लचीले रहें? कितने लोग अपने काम के लिए “जान-पहचान” या “सिफारिश” को सामान्य मानते हैं? कितने लोग भ्रष्टाचार को गलत तो कहते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर उसे स्वीकार कर लेते हैं? व्यवस्था और समाज अलग-अलग चीजें नहीं हैं। जिस समाज में नियमों को बाधा समझा जाता है, वहां नियम लागू करने वाला अधिकारी अक्सर कठोर दिखाई देगा। और जिस समाज में कानून को अधिकार और जिम्मेदारी दोनों के रूप में स्वीकार किया जाता है, वहां कानून लागू करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया होगी। असली आदर्श क्या होना चाहिए? हमें टुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की जरूरत है। लेकिन हमारा आदर्श यह नहीं होना चाहिए कि हर विभाग में एक ऐसा अधिकारी खोजा जाए जो अकेले व्यवस्था को ठीक कर दे। हमारा आदर्श इससे बड़ा होना चाहिए। हमें ऐसी संस्थाएं चाहिए जहां— अधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले। राजनीतिक और बाहरी दबाव के बावजूद नियम लागू किए जा सकें। कार्रवाई व्यक्ति की इच्छा पर नहीं, स्पष्ट प्रक्रिया पर निर्भर हो। लापरवाही की जवाबदेही तय हो। ईमानदार अधिकारी को असामान्य नहीं, सामान्य माना जाए। और अधिकारी के स्थानांतरण के साथ व्यवस्था की कार्यप्रणाली न बदल जाए। क्योंकि अगर एक अधिकारी के जाने से पूरा सिस्टम बदल जाता है, तो समस्या अधिकारी में नहीं, सिस्टम में है। हीरो नहीं, जवाबदेह व्यवस्था टुकाराम मुंडे की तरह कोई अधिकारी जब अपनी जिम्मेदारी निभाता है तो उसकी सराहना करना गलत नहीं है। गलती तब होगी जब हम उस सराहना को व्यवस्था की सफलता मान लें। किसी अधिकारी का अच्छा काम हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि ऐसा काम हर अधिकारी से अपेक्षित क्यों नहीं है? हमें ऐसे अधिकारियों को देखकर सिर्फ तालियां नहीं बजानी चाहिए। हमें यह भी पूछना चाहिए कि जो अधिकारी अपना कर्तव्य नहीं निभाते, उनके लिए जवाबदेही की व्यवस्था क्या है? क्योंकि एक लोकतंत्र में नागरिक का अधिकार किसी अधिकारी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। कानून इसलिए लागू नहीं होना चाहिए कि अधिकारी ईमानदार है। कानून इसलिए लागू होना चाहिए क्योंकि वह कानून है। और जनता को इसलिए न्याय नहीं मिलना चाहिए कि उसे कोई “अच्छा अधिकारी” मिल गया। न्याय मिलना चाहिए क्योंकि वह उसका अधिकार है। यही फर्क है एक अच्छे अधिकारी और एक अच्छी व्यवस्था के बीच। अच्छा अधिकारी व्यवस्था की कमी को कुछ समय के लिए भर सकता है। लेकिन अच्छी व्यवस्था को किसी हीरो की जरूरत नहीं होती। शायद इसलिए टुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल उनकी तारीफ नहीं, बल्कि वह आईना है जो वे हमारे सामने रखते हैं। क्या किसी अधिकारी का सिर्फ अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाना आज हमें "heroism" लगने लगा है? अगर हाँ, तो सवाल उस अधिकारी से कम और हमसे ज्यादा है। सवाल यह नहीं कि एक अधिकारी इतना अच्छा क्यों है। सवाल यह है कि अच्छा अधिकारी होना इतना असामान्य क्यों हो गया है?

  • 'Marathon' के नाम पर जोखिम: आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न | Bansal Pankh Marathon Bhopal

    भोपाल जैसे शहर में, जहाँ यातायात प्रबंधन स्वयं एक निरंतर चुनौती बना हुआ है, खुले सार्वजनिक मार्गों पर हजारों प्रतिभागियों के साथ Bansal Pankh Marathon जैसे बड़े खेल आयोजन करना क्या पर्याप्त तैयारी और जोखिम मूल्यांकन के बाद किया गया निर्णय था? ट्रैक्टर और मैराथन प्रतिभागी आमने-सामने भोपाल में आयोजित Bansal Pankh Marathon की जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने शहर में मैराथन जैसे सार्वजनिक खेल आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। प्रतिभागियों के बीच भारी वाहन, कारें और बाइकें स्पष्ट रूप से नजर आ रही हैं—जो किसी भी क्षण गंभीर दुर्घटना को न्योता दे सकती थीं। चिंताजनक यह भी है कि चलते यातायात के दौरान बीच सड़क पर एक प्रतिभागी बैठी दिखाई दे रही है। चलते यातायात के दौरान एक प्रतिभागी बीच सड़क पर बैठी हुई कार की टक्कर से बाल-बाल बचता हुआ बच्चा यह दृश्य केवल एक चूक नहीं, बल्कि आयोजन प्रबंधन, ट्रैफिक नियंत्रण और सुरक्षा समन्वय की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। मैराथन निस्संदेह एक सकारात्मक और स्वास्थ्यवर्धक पहल है। यह किसी भी शहर की जीवंतता, सामुदायिक भागीदारी और नागरिक उत्साह का प्रतीक बन सकती है। किन्तु प्रश्न तब उठता है जब इसे ऐसे शहरी परिवेश में आयोजित किया जाए, जहां तेज गति और लापरवाही से वाहन चलाना, ट्रैफिक जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और सिग्नल उल्लंघन जैसी समस्याएँ आम हों। भोपाल जैसे शहर में, जहाँ यातायात प्रबंधन स्वयं एक निरंतर चुनौती बना हुआ है, खुले सार्वजनिक मार्गों पर हजारों प्रतिभागियों के साथ मैराथन आयोजित करना क्या पर्याप्त तैयारी और जोखिम मूल्यांकन के बाद किया गया निर्णय था? यदि नियमित दिनों में भी ट्रैफिक नियंत्रण पूरी तरह प्रभावी नहीं है, तो फिर बड़े सार्वजनिक आयोजनों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भरोसा किस आधार पर दिया जाता है? यह खेल भावना के विरोध का प्रश्न नहीं है—यह सुरक्षा, जवाबदेही और सुविचारित शहरी प्रबंधन का प्रश्न है। सड़कें मूल रूप से यातायात के लिए बनाई जाती हैं। दौड़ जैसे आयोजनों के लिए विशेष ट्रैक, स्टेडियम या पूर्णतः नियंत्रित मार्गों की आवश्यकता होती है। दुनिया के बड़े शहरों में मैराथन उन्हीं मार्गों पर कराई जाती हैं जहां या तो ट्रैफिक पूरी तरह रोका जा सके या जहां वैकल्पिक मार्गों की ठोस व्यवस्था हो। भोपाल में क्या ऐसी योजना बनाई गई थी? और अगर बनाई गई थी तो प्रतिभागियों के समीप वाहन कैसे पहुँचे? आयोजकों को समझना चाहिए कि लोकप्रियता या प्रचार के लिए नागरिकों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती। ऐसे आयोजन तभी संभव हैं— जब मार्ग पूर्णतः सुरक्षित हो जब ट्रैफिक डायवर्जन प्रभावी हो जब आपातकालीन चिकित्सा सुविधा तुरंत उपलब्ध हो जब स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक विभाग समन्वित रूप से काम करे खेल और स्वास्थ्य को बढ़ावा देना आवश्यक है। लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है — नागरिकों की सुरक्षा। यदि व्यवस्था पुख्ता न हो, तो उत्सव कभी भी हादसे में बदल सकता है।

  • 3 फीट का कद… लेकिन सिस्टम से ऊँचा हौसला — Dr. Ganesh Baraiya की कहानी और उस सोच पर सवाल जो अक्सर लोगों को उनके कद, शरीर या कमजोरी से मापती है।

    भारत में अक्सर कहा जाता है कि अगर आप अलग हैं, तो सिस्टम आपको रोकने की कोशिश जरूर करेगा। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो रुकते नहीं, बल्कि सिस्टम को ही बदलने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसी ही कहानी है Dr. Ganesh Baraiya की। गुजरात के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गणेश बारैया की ऊँचाई महज 3 फीट है। उन्हें ड्वार्फिज़्म के कारण 72% दिव्यांगता है। लेकिन बचपन से उनका सपना साफ था—डॉक्टर बनना और लोगों का इलाज करना। साल 2018 में उन्होंने देश की सबसे कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा National Eligibility cum Entrance Test (NEET) पास कर ली। यह किसी भी छात्र के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। लेकिन गणेश के लिए असली लड़ाई इसके बाद शुरू हुई। मेडिकल शिक्षा की उस समय की नियामक संस्था Medical Council of India ने यह कहकर उन्हें MBBS में प्रवेश देने से मना कर दिया कि उनकी ऊँचाई कम है और वे डॉक्टर का काम ठीक से नहीं कर पाएंगे। यानी सवाल यह नहीं था कि उन्होंने परीक्षा पास की है या नहीं, बल्कि यह था कि उनका कद कितना है। लेकिन गणेश बारैया ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की और मामला अंततः देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India तक पहुँच गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा— किसी इंसान की ऊँचाई उसके डॉक्टर बनने की क्षमता तय नहीं कर सकती। इस फैसले के बाद गणेश को गुजरात के Government Medical College Bhavnagar में MBBS में प्रवेश मिला। कई चुनौतियों, मुश्किल प्रैक्टिकल और शारीरिक सीमाओं के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। आज वही गणेश बारैया डॉ. गणेश बारैया हैं — एक ऐसे डॉक्टर, जिनका कद भले ही 3 फीट हो, लेकिन उनका हौसला उस सिस्टम से भी ऊँचा निकला जिसने कभी उन्हें रोकने की कोशिश की थी। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जो अक्सर लोगों को उनके कद, शरीर या कमजोरी से मापती है। अगर Dr. Ganesh Baraiya समाज की इसी सोच की वजह से हार मान लेते, तो हमारे देश में एक डॉक्टर कम हो जाता। कभी-कभी एक इंसान की जिद सिर्फ उसकी जिंदगी नहीं बदलती, बल्कि पूरे सिस्टम को आईना दिखा देती है।

  • मशीन को मंच, जीवित को बहिष्कार! शिक्षा की दिशा पर बड़ा सवाल? Galgotias University AI Impact Summit 2026

    Galgotias University - AI Impact Summit 2026 - AI Robot Dog - Illegal Dog Relocation दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit 2026 के दौरान Galgotias University ने एक रोबोट डॉग को अपने इनोवेशन के रूप में प्रस्तुत किया। वीडियो वायरल हुआ, तो सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई उपयोगकर्ताओं और फैक्ट-चेकर्स ने दावा किया कि यह रोबोट वास्तव में चीन की कंपनी Unitree Robotics का मॉडल है - विशेष रूप से Unitree Go2 - जो बाजार में उपलब्ध एक रेडीमेड प्रोडक्ट है। समिट में यूनिवर्सिटी प्रतिनिधि ने रोबोट का नाम “ओरियन” बताते हुए कहा कि यह उनके Centre of Excellence में विकसित किया गया है। साथ ही यह भी दावा किया गया कि यूनिवर्सिटी ₹350 करोड़ के AI इकोसिस्टम निवेश की दिशा में अग्रसर है। हालांकि विवाद बढ़ने पर यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर सफाई दी कि उन्होंने इस रोबोट को स्वयं विकसित करने का दावा नहीं किया था, बल्कि इसे छात्रों के शिक्षण और प्रयोग के उद्देश्य से खरीदा गया है। यदि हम यह मान भी लें कि रोबोट को शैक्षणिक प्रयोग और तकनीकी प्रशिक्षण के लिए खरीदा गया हो, तब भी एक नैतिक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है। कुछ महीनों पूर्व इसी शिक्षण संस्थान पर आरोप लगे थे कि उसने परिसर के आसपास रहने वाले देशी नस्ल के जीवित कुत्तों को गैरकानूनी तरीके से हटवा दिया। यदि यह सत्य है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। एक ओर विदेशी रोबोटिक कुत्ते को “नवाचार” और “भविष्य की तकनीक” का प्रतीक बनाकर मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, वहीं दूसरी ओर जीवित प्राणियों को परिसर से बाहर कर दिया जाता है। यह केवल एक संस्थान की भूल या विवाद भर नहीं है - यह हमारे समय का दार्शनिक प्रश्न है। क्या हम ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ संवेदनशील, जीवित प्राणियों की अपेक्षा मशीनें अधिक मूल्यवान प्रतीत होने लगी हैं? क्या शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता देना रह गया है, या उन्हें संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और करुणा जैसे मूल्यों का भी संरक्षण करना चाहिए? तकनीक का विकास आवश्यक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन भविष्य की वास्तविकताएँ हैं। परंतु क्या तकनीकी प्रगति मानवता और जीवों के प्रति दायित्व से ऊपर हो सकती है? विद्यार्थी केवल मशीनों से नहीं सीखते - वे वातावरण से सीखते हैं। वे सहानुभूति, जिम्मेदारी और जीवन के मूल सिद्धांत भी अपने आसपास के अनुभवों से ग्रहण करते हैं। यदि किसी परिसर में जीवित प्राणियों के लिए स्थान नहीं है, तो क्या वहाँ मानवीय मूल्यों के लिए भी पर्याप्त स्थान बचा है? आज सवाल केवल एक रोबोट डॉग का नहीं है। सवाल यह है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं - एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ तकनीक सर्वोच्च है, या एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ तकनीक और संवेदनशीलता साथ-साथ चलें? शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने की जगह नहीं होते, वे समाज की दिशा तय करते हैं। ऐसे में उन्हें यह तय करना होगा कि भविष्य की पीढ़ियों को वे किस प्रकार का भारत सौंपना चाहते हैं - मशीनों से समृद्ध, या मूल्यों से संपन्न?

  • भोपाल में कचरा प्रबंधन की स्थिति: स्मार्ट सिटी के दावे और ज़मीनी सच्चाई

    Bhopal Smart City - Bhopal Municipal Corporation - Swachh Bhopal - Bhopal Waste Management भोपाल में प्रतिदिन कितना कचरा उत्पन्न होता है? भोपाल में नगर निगम के अनुमान के अनुसार प्रतिदिन लगभग 800 टन से अधिक ठोस कचरा (Solid Waste) उत्पन्न होता है। शहर के विस्तार, बढ़ती आबादी और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण यह मात्रा लगातार बढ़ रही है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) किसी भी स्मार्ट सिटी के लिए बुनियादी आवश्यकता है। सवाल यह है — क्या भोपाल में उत्पन्न होने वाला पूरा कचरा वैज्ञानिक तरीके से संसाधित हो रहा है? भारत में कचरा प्रोसेसिंग की राष्ट्रीय स्थिति Central Pollution Control Board (CPCB) की रिपोर्टों के अनुसार भारत में उत्पन्न कुल शहरी ठोस कचरे का लगभग 60–70% ही प्रोसेस किया जाता है। शेष कचरा लैंडफिल या अनियंत्रित डंपिंग के रूप में समाप्त होता है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर यह स्थिति है, तो भोपाल जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में प्रोसेसिंग क्षमता और वास्तविक निस्तारण के आंकड़े सार्वजनिक होना और भी आवश्यक हो जाता है। क्या स्मार्ट सिटी का दर्जा ज़मीन पर दिखता है? भोपाल को स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत कई विकास कार्यों के लिए चुना गया है। तकनीकी समाधान, डोर-टू-डोर कलेक्शन, और स्वच्छता रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन जैसे दावे सामने आते हैं। लेकिन कई वार्डों में नागरिकों की शिकायतें अभी भी सुनाई देती हैं: खाली प्लॉट में कचरा डंपिंग निर्माण मलबे का ढेर बरसात में जाम नालियाँ अस्थायी कचरा ढेर अगर रोज़ 800 टन कचरा उठ रहा है, तो ये समस्याएँ क्यों बनी हुई हैं? नगर निगम भोपाल में पारदर्शिता का सवाल स्मार्ट गवर्नेंस का अर्थ केवल डिजिटल सिस्टम नहीं, बल्कि ओपन डेटा और जवाबदेही भी है। महत्वपूर्ण प्रश्न: क्या वार्ड-वार कचरा उत्पादन का डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध है? प्रोसेसिंग प्लांट की अधिकतम क्षमता क्या है? वास्तविक रूप से कितना कचरा कम्पोस्ट, रीसायकल या ऊर्जा में परिवर्तित होता है? कितना कचरा लैंडफिल में जाता है? करदाता नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनका टैक्स किस प्रकार उपयोग हो रहा है। भोपाल में बेहतर कचरा प्रबंधन कैसे संभव है? 1. सोर्स सेग्रीगेशन (घर स्तर पर कचरा पृथक्करण) गीला और सूखा कचरा अलग करना अनिवार्य और निगरानी योग्य बनाया जाए। 2. वार्ड-स्तरीय सार्वजनिक डैशबोर्ड दैनिक संग्रहण और निस्तारण का डेटा सार्वजनिक किया जाए। 3. निर्माण मलबा प्रबंधन नीति C&D waste (Construction & Demolition Waste) के लिए अलग व्यवस्था। 4. नागरिक भागीदारी स्थानीय निगरानी समितियाँ और शिकायत निवारण की समयबद्ध प्रणाली। क्या भोपाल का कचरा प्रबंधन वास्तव में स्मार्ट है? भोपाल को स्मार्ट सिटी कहना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन वास्तविक स्मार्टनेस पारदर्शिता, दक्षता और सतत प्रबंधन से आती है। जब तक डेटा सार्वजनिक नहीं होगा और वार्ड-स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सवाल उठते रहेंगे। क्या भोपाल में कचरा प्रबंधन केवल रिपोर्टों में बेहतर है, या वास्तव में हर गली में बदलाव दिख रहा है?

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