प्रयोगशालाओं में बेजुबानों की परीक्षा: क्या भारत में पशु कल्याण के नियम कमजोर पड़ने जा रहे हैं? (भारत में पशुओं पर प्रयोग के नए नियम 2026)

वैज्ञानिक अनुसंधान जरूरी है, लेकिन क्या उसकी कीमत उन जानवरों को चुकानी चाहिए जो अपने दर्द के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा सकते? प्रयोगों की मंजूरी, निगरानी और पशुओं की सुरक्षा से जुड़े नए मसौदे पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
Prevention of Cruelty to Animals (Control and Supervision of Experiment, Breeding and Trading of Laboratory Animals) Rules, 2026

किसी दवा की सुरक्षा जांचनी हो, किसी बीमारी का अध्ययन करना हो या चिकित्सा विज्ञान में नई खोज करनी हो—वैज्ञानिक अनुसंधान मानव जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन जब इस अनुसंधान में किसी जीव को दर्द, तनाव या पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो एक बुनियादी सवाल उठता है: विज्ञान की प्रगति के लिए इस्तेमाल होने वाले बेजुबान जीवों के अधिकारों और सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
भारत में प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले नियमों को बदलने का प्रस्ताव इसी सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ले आया है।
केंद्र सरकार की समिति Committee for Control and Supervision of Experiments on Animals (CCSEA) ने सितंबर 2026 में पशुओं पर प्रयोग, उनके प्रजनन और व्यापार से संबंधित नए नियमों का मसौदा जारी किया। यह मसौदा 1968 और 1998 के मौजूदा नियमों की जगह लेने के लिए प्रस्तावित है। सरकार का उद्देश्य वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रक्रिया को आधुनिक बनाना और प्रयोगों को उनकी संभावित पीड़ा के आधार पर वर्गीकृत करना है। लेकिन पशु कल्याण से जुड़े संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों पर गंभीर चिंताएं जताई हैं।
यह अभी एक प्रस्तावित मसौदा है, अंतिम नियम नहीं। इसलिए इस पर सवाल उठाना, इसकी समीक्षा करना और जरूरी बदलावों की मांग करना नागरिकों के अधिकार के साथ-साथ सार्वजनिक हित में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सबसे बड़ा सवाल: प्रयोग की मंजूरी कौन देगा?
मसौदे में प्रस्ताव है कि प्रयोगों को उनसे होने वाली संभावित पीड़ा के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा जाए—माइल्ड, मॉडरेट, सीवियर और नॉन-रिकवरी।
प्रस्ताव के अनुसार, हल्के और मध्यम स्तर के प्रयोगों को संबंधित संस्थान की अपनी Institutional Animal Ethics Committee (IAEC) मंजूरी दे सकेगी। वहीं, गंभीर और नॉन-रिकवरी श्रेणी के कुछ प्रयोगों के लिए केंद्रीय समिति की मंजूरी की व्यवस्था होगी।
पहली नजर में यह व्यवस्था प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास लग सकती है। लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है।
जिस संस्थान को किसी प्रयोग की मंजूरी चाहिए, यदि उसी संस्थान की समिति यह तय करे कि प्रयोग कितना गंभीर है और उसे मंजूरी भी दे, तो स्वतंत्र निगरानी कितनी प्रभावी रह जाएगी?
संस्थागत नैतिक समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन उनकी स्वतंत्रता, निर्णय लेने की प्रक्रिया और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। जब किसी प्रयोग की श्रेणी ही यह तय कर सकती है कि केंद्रीय स्तर पर उसकी समीक्षा होगी या नहीं, तब वर्गीकरण की निष्पक्षता निर्णायक बन जाती है।
यह केवल प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है जो जानवरों को अनावश्यक पीड़ा से बचाने के लिए बनाई गई है।
क्या किसी पीड़ा को 'हल्का' कह देने से वह कम हो जाती है?
किसी प्रयोग को माइल्ड या मॉडरेट श्रेणी में रखना वैज्ञानिक मूल्यांकन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन क्या केवल श्रेणी तय कर देने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि उस प्रयोग में शामिल जीव को असहनीय पीड़ा नहीं होगी?
मसौदे के साथ दिए गए वर्गीकरण में कुछ ऐसी स्थितियां भी शामिल हैं जिनमें जानवरों को सीमित अवधि के लिए अकेला रखना, भोजन से वंचित करना या ऐसे उद्दीपकों के संपर्क में लाना शामिल है जिनसे वे बच नहीं सकते।
प्रश्न यह नहीं है कि हर प्रयोग अनिवार्य रूप से क्रूर है। प्रश्न यह है कि किसी प्रयोग से होने वाली पीड़ा का आकलन किन मानकों पर होगा, उसकी स्वतंत्र समीक्षा कौन करेगा और यदि वास्तविक पीड़ा अनुमान से अधिक हो जाए तो उसे रोकने की व्यवस्था क्या होगी।
जानवर अपनी पीड़ा को इंसानी भाषा में बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनकी सुरक्षा का दायित्व उस व्यवस्था पर और अधिक बढ़ जाता है जो उनके बारे में निर्णय लेती है।
जानवर कहां से आएंगे, इसकी निगरानी कौन करेगा?
मसौदे के कुछ प्रावधान पशुओं के स्रोत को लेकर भी चिंता पैदा करते हैं। कुछ परिस्थितियों में, निर्धारित पंजीकृत प्रजनकों से पशु उपलब्ध न होने पर, फार्म पशुओं, मछलियों और पक्षियों को खुले बाजार या अपंजीकृत स्रोतों से प्राप्त करने की अनुमति देने का प्रस्ताव है, बशर्ते संबंधित संस्थागत समिति इसकी मंजूरी दे।
यहां सवाल पशुओं की उपलब्धता भर का नहीं है। सवाल है कि उनके स्रोत की वैधता, परिवहन, स्वास्थ्य, प्रजनन और प्रयोगशाला तक पहुंचने की प्रक्रिया की निगरानी कैसे होगी।
मसौदे में आवारा और जंगली प्रकृति के पशुओं के इस्तेमाल पर रोक के साथ कुछ अपवादों की भी गुंजाइश रखी गई है। ऐसे अपवादों के लिए स्पष्ट परिभाषा, स्वतंत्र अनुमति और कड़ी निगरानी आवश्यक है।
विशेष रूप से आवारा कुत्तों के मामले में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सड़क पर रहने वाले जानवरों को किसी भी अस्पष्ट प्रावधान के सहारे प्रयोगशालाओं तक पहुंचाने का रास्ता न खुले।
जो जानवर पहले से ही इंसानी लापरवाही और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, क्या उन्हें अब वैज्ञानिक अनुसंधान की कमजोर निगरानी का जोखिम भी उठाना चाहिए?
क्या विज्ञान के पास पशुओं के विकल्प नहीं हैं?
आज वैज्ञानिक अनुसंधान में मानव कोशिकाओं पर आधारित परीक्षण, ऑर्गन-ऑन-चिप तकनीक, कंप्यूटर आधारित मॉडल और अन्य गैर-पशु परीक्षण विधियों पर काम हो रहा है। हर विधि हर प्रयोग का विकल्प नहीं बन सकती, लेकिन जहां वैज्ञानिक रूप से मान्य और उपयुक्त विकल्प उपलब्ध हैं, वहां उनका इस्तेमाल प्राथमिकता से होना चाहिए।
पशु अनुसंधान के संदर्भ में दुनिया भर में तीन सिद्धांत महत्वपूर्ण माने जाते हैं:
Replacement: जहां संभव हो, जीवित जानवरों के स्थान पर उपयुक्त वैकल्पिक विधियों का इस्तेमाल।
Reduction: वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय परिणाम पाने के लिए आवश्यक न्यूनतम संख्या में जानवरों का उपयोग।
Refinement: प्रयोग की प्रक्रिया, देखभाल और परिस्थितियों में सुधार करके दर्द और तनाव को न्यूनतम करना।
मसौदे में इन सिद्धांतों का उल्लेख है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इनके पालन को पर्याप्त रूप से अनिवार्य, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाएगा?
केवल यह कहना कि विकल्प उपलब्ध होने पर उनका उपयोग किया जाए, पर्याप्त नहीं है। संस्थानों से यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वे प्रयोग की मंजूरी मांगते समय उपलब्ध विकल्पों की जांच का प्रमाण दें और बताएं कि पशुओं का इस्तेमाल क्यों आवश्यक है।
पारदर्शिता के बिना नैतिकता अधूरी है
यदि किसी संस्थान की समिति प्रयोगों को मंजूरी देती है, तो आम जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि निगरानी किस तरह की जा रही है और नियमों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई होती है।
इसके लिए कुछ बुनियादी व्यवस्थाएं आवश्यक हैं:
प्रयोगों की मंजूरी और उनकी श्रेणी तय करने के स्पष्ट मानक।
स्वतंत्र निरीक्षण और नियमित अनुपालन जांच।
पशुओं की मृत्यु, गंभीर पीड़ा और नियमों के उल्लंघन से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग।
प्रयोगों के बाद पुनर्वास और देखभाल की स्पष्ट जिम्मेदारी।
नियम तोड़ने वाले संस्थानों के लिए प्रभावी दंड और पंजीकरण निलंबित करने की व्यवस्था।
जहां वैज्ञानिक और कानूनी रूप से संभव हो, वहां प्रयोगों और उनके नैतिक मूल्यांकन से जुड़ी सार्वजनिक जानकारी।
नैतिकता केवल एक समिति का प्रमाणपत्र नहीं हो सकती। उसे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए और उसकी जांच भी संभव होनी चाहिए।
सरकार से सवाल पूछना विज्ञान का विरोध नहीं है
इस बहस को विज्ञान बनाम पशु अधिकार के रूप में देखना सही नहीं होगा। मानव स्वास्थ्य की रक्षा करना और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। लेकिन अनुसंधान को सुरक्षित, पारदर्शी और नैतिक बनाना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
यदि कोई नियम वैज्ञानिक संस्थानों के लिए प्रक्रिया आसान करता है, तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि उस सुविधा के कारण निगरानी कमजोर न पड़े। प्रशासनिक दक्षता और पशु कल्याण एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नए मसौदे से स्वतंत्र निगरानी पर क्या प्रभाव पड़ेगा, पशुओं के स्रोत की जांच कैसे होगी, विकल्पों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था कितनी मजबूत होगी और उल्लंघन होने पर जवाबदेही किसकी होगी।
नियमों का मूल्यांकन उनके उद्देश्य से ही नहीं, उनके वास्तविक प्रभाव से भी किया जाना चाहिए।
नागरिकों की भूमिका: सवाल पूछें, अपनी आपत्ति दर्ज करें
इस मसौदे पर जनता से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए हैं। ऐसे अवसरों पर नागरिकों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। लोकतंत्र में सार्वजनिक परामर्श केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होना चाहिए; यह नीतियों को बेहतर बनाने का माध्यम है।
जो नागरिक पशु कल्याण, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वतंत्र निगरानी को लेकर चिंतित हैं, वे मसौदे को पढ़कर अपनी आपत्तियां संबंधित समिति तक पहुंचा सकते हैं। अपनी बात तथ्यों और विशिष्ट प्रावधानों के आधार पर रखना अधिक प्रभावी होगा।
आपत्ति और सुझाव भेजने का विवरण
मसौदा: Prevention of Cruelty to Animals (Control and Supervision of Experiment, Breeding and Trading of Laboratory Animals) Rules, 2026
अधिसूचना संख्या: G.S.R. 864(E)
संबंधित समिति: CCSEA
ईमेल: cpcsea-mef@gov.in
आपत्ति भेजने की अंतिम तिथि: 5 नवंबर 2026 — उपलब्ध सार्वजनिक परामर्श सूचना के अनुसार।
मसौदे और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया की जानकारी CCSEA की आधिकारिक वेबसाइट पर देखी जा सकती है। ईमेल भेजने से पहले आधिकारिक अधिसूचना में समय-सीमा और प्रक्रिया की पुष्टि अवश्य करें।
अंत में: जिनकी आवाज नहीं, उनके अधिकारों पर सवाल जरूरी हैं
एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह अपने नागरिकों की कितनी अच्छी देखभाल करता है। यह भी मायने रखता है कि वह उन जीवों के प्रति कितना जिम्मेदार है जो अपने अधिकारों के लिए अदालत, संसद या किसी सरकारी कार्यालय में नहीं जा सकते।
वैज्ञानिक प्रगति जरूरी है। लेकिन प्रगति के नाम पर निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता क्यों किया जाए?
अगर किसी प्रयोग की मंजूरी देने वाली व्यवस्था में स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, अगर पीड़ा का वर्गीकरण ही बाहरी समीक्षा का रास्ता तय करता है और अगर विकल्पों को अपनाने की जवाबदेही स्पष्ट नहीं है, तो इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए।
क्योंकि विज्ञान को आगे बढ़ाने का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है—और जीवन की रक्षा के सिद्धांत को उन जीवों तक भी पहुंचना चाहिए जो अपनी पीड़ा खुद बयान नहीं कर सकते।


